रीवा: मध्य प्रदेश के रीवा जिले में रहने वाले एक मैकेनिकल इंजीनियर, नीरज कुमार सिंह ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर एक मिसाल कायम की है। वे मुंबई और रीवा के बीच सफर करते हुए 'सोना मोती' गेहूं और 'बुद्ध' चावल जैसी प्राचीन फसलों की खेती कर रहे हैं। नीरज की यह फसलें, रासायनिक रूप से उगाए गए फसलों की तुलना में 1.5 से 2 गुना अधिक कीमत पर बिकती हैं।
दूसरों को भी कर रहे प्रेरित
नीरज न केवल इन पारंपरिक अनाजों को पुनर्जीवित कर रहे हैं, बल्कि टिकाऊ और रासायनिक मुक्त खेती के माध्यम से दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित एक प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया और अब वह गाय के गोबर और मूत्र से प्राकृतिक उर्वरक और कीटनाशक तैयार करके प्रति एकड़ 2 से 3 गुना अधिक उपज प्राप्त कर रहे हैं।
कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर बने किसान
नीरज कुमार सिंह ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री हासिल की और उनके पास एक अच्छी कॉर्पोरेट नौकरी भी थी। लेकिन उनका मन कुछ ऐसा करने के लिए लालायित था जो न केवल उनके जीवन में, बल्कि दूसरों के जीवन में भी बदलाव लाए। उन्होंने बताया कि 'मैं हमेशा से प्राकृतिक खेती के प्रति जुनूनी था। मैंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में पांच साल तक काम किया, लेकिन मैं उस अंदर की आवाज को अनदेखा नहीं कर सका, जो मुझे जमीन की ओर धकेल रही थी।'
2014 में सुन ली दिल की आवाज
दिसंबर 2014 में, नीरज ने आखिरकार उस आवाज को सुना। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और फुल टाइम प्राकृतिक खेती करने के लिए मध्य प्रदेश के रीवा में अपने पैतृक स्थान पर लौट आए। एक स्थिर करियर छोड़ना आसान नहीं था। नीरज को परिवार और दोस्तों से सवाल सुनने को मिले कि खेती-किसानी के लिए कोई सुरक्षित नौकरी क्यों छोड़ेगा।
जॉब छो़ड़कर कैसे बने सफल किसान?
नीरज को आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा 2013 में आयोजित एक कार्यक्रम से प्रेरणा मिली। यह कार्यक्रम प्राकृतिक खेती शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम के नाम से था। इसी के माध्यम से नीरज को स्पष्टता और प्रेरणा मिली। वह याद करते हुए कहते हैं कि 'मैं चकित था। इस प्राचीन लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्राकृतिक उर्वरकों और कीटनाशकों को कैसे तैयार किया जाए, जमीन के खिलाफ काम न करके, साथ कैसे काम किया जाए। इसने मेरे लिए सब कुछ बदल दिया।'
यहां किया शुरुआती निवेश
सीमित संसाधनों के साथ, नीरज ने गायों में निवेश किया। न केवल दूध के लिए बल्कि प्राकृतिक खेती में उनके अमूल्य योगदान के लिए भी। नीरज कहते हैं कि 'गाय का गोबर और मूत्र पोषक तत्वों का समृद्ध स्रोत हैं। मैं उनका उपयोग पंचगव्य और जीवामृत जैसे शक्तिशाली, सभी प्राकृतिक उर्वरकों और कीटनाशकों को तैयार करने के लिए करता हूं। एक गाय से, वे एक एकड़ जमीन की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम थे, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता पूरी तरह से समाप्त हो गई। इतना ही नहीं, दूध और दूध उत्पाद आय का एक अतिरिक्त स्रोत बन गए।
साइड इनकम से हो रही अच्छी कमाई
नीरज बताते हैं कि मैं केवल दूध उत्पादों को बेचकर लगभग 75,000 रुपये प्रति माह कमाता हूं। आज उर्वरकों और कीटनाशकों के लिए मेरी लागत शून्य है। रासायनिक खेती की तुलना में, मुझे प्रति एकड़ भूमि पर आसानी से 2 से 3 गुना अधिक उपज मिलती है। वह कहते हैं कि 'मैं सोना मोती गेहूं को रासायनिक रूप से उगाए गए गेहूं की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत पर बेचता हूं।
दूसरों को भी कर रहे प्रेरित
नीरज न केवल इन पारंपरिक अनाजों को पुनर्जीवित कर रहे हैं, बल्कि टिकाऊ और रासायनिक मुक्त खेती के माध्यम से दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित एक प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया और अब वह गाय के गोबर और मूत्र से प्राकृतिक उर्वरक और कीटनाशक तैयार करके प्रति एकड़ 2 से 3 गुना अधिक उपज प्राप्त कर रहे हैं।
कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर बने किसान
नीरज कुमार सिंह ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री हासिल की और उनके पास एक अच्छी कॉर्पोरेट नौकरी भी थी। लेकिन उनका मन कुछ ऐसा करने के लिए लालायित था जो न केवल उनके जीवन में, बल्कि दूसरों के जीवन में भी बदलाव लाए। उन्होंने बताया कि 'मैं हमेशा से प्राकृतिक खेती के प्रति जुनूनी था। मैंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में पांच साल तक काम किया, लेकिन मैं उस अंदर की आवाज को अनदेखा नहीं कर सका, जो मुझे जमीन की ओर धकेल रही थी।'
2014 में सुन ली दिल की आवाज
दिसंबर 2014 में, नीरज ने आखिरकार उस आवाज को सुना। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और फुल टाइम प्राकृतिक खेती करने के लिए मध्य प्रदेश के रीवा में अपने पैतृक स्थान पर लौट आए। एक स्थिर करियर छोड़ना आसान नहीं था। नीरज को परिवार और दोस्तों से सवाल सुनने को मिले कि खेती-किसानी के लिए कोई सुरक्षित नौकरी क्यों छोड़ेगा।
जॉब छो़ड़कर कैसे बने सफल किसान?
नीरज को आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा 2013 में आयोजित एक कार्यक्रम से प्रेरणा मिली। यह कार्यक्रम प्राकृतिक खेती शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम के नाम से था। इसी के माध्यम से नीरज को स्पष्टता और प्रेरणा मिली। वह याद करते हुए कहते हैं कि 'मैं चकित था। इस प्राचीन लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्राकृतिक उर्वरकों और कीटनाशकों को कैसे तैयार किया जाए, जमीन के खिलाफ काम न करके, साथ कैसे काम किया जाए। इसने मेरे लिए सब कुछ बदल दिया।'
यहां किया शुरुआती निवेश
सीमित संसाधनों के साथ, नीरज ने गायों में निवेश किया। न केवल दूध के लिए बल्कि प्राकृतिक खेती में उनके अमूल्य योगदान के लिए भी। नीरज कहते हैं कि 'गाय का गोबर और मूत्र पोषक तत्वों का समृद्ध स्रोत हैं। मैं उनका उपयोग पंचगव्य और जीवामृत जैसे शक्तिशाली, सभी प्राकृतिक उर्वरकों और कीटनाशकों को तैयार करने के लिए करता हूं। एक गाय से, वे एक एकड़ जमीन की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम थे, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता पूरी तरह से समाप्त हो गई। इतना ही नहीं, दूध और दूध उत्पाद आय का एक अतिरिक्त स्रोत बन गए।
साइड इनकम से हो रही अच्छी कमाई
नीरज बताते हैं कि मैं केवल दूध उत्पादों को बेचकर लगभग 75,000 रुपये प्रति माह कमाता हूं। आज उर्वरकों और कीटनाशकों के लिए मेरी लागत शून्य है। रासायनिक खेती की तुलना में, मुझे प्रति एकड़ भूमि पर आसानी से 2 से 3 गुना अधिक उपज मिलती है। वह कहते हैं कि 'मैं सोना मोती गेहूं को रासायनिक रूप से उगाए गए गेहूं की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत पर बेचता हूं।
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